पटना,विधि संवददाता । पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के आरक्षण सीमा बढ़ाने के फैसले को गुरुवार को निरस्त कर दिया ।
राज्य सरकार ने शिक्षण संस्थानों व सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी,ओबीसी और ईबीसी को आरक्षण 50 फीसदी से बढ़ाकर 65 फीसदी कर दिया था । कोर्ट ने 4 से 11 मार्च तक चली सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित कर लिया था ।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति के विनोद चन्द्रन एवं न्यायमूर्ति हरीश कुमार की खंडपीठ ने गुरुवार को 87 पन्नों में यह आदेश दिया कोर्ट ने कहा, बिहार में कुल आबादी के 1.57 प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं । प्रत्येक श्रेणी के कर्मचारियों के अनुपात को देखा जाए तो उनकी कुल जनसंख्या की तुलना में मुक्त श्रेणी को 3.19 प्रतिशत बढ़त है ।
हालांकि, सरकारी रोजगार में पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के अनुपात की तुलना कुल सरकारी कर्मचारियों की संख्या पर गणना किए जाने पर पिछड़े वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है । कुल 20,49,370 सरकारीकर्मियों में से अन्य पिछड़ा वर्ग की भागेदारी 30.32 फीसदी है । अत्यंत पिछड़े वर्ग की भागेदारी 22.53 फीसदी है । अनुसूचित जाति का हिस्सा 14.19 और अनुसूचित जनजाति का 1.47 फीसदी है ।
आदेश पढ़ने के बाद चुनौती देने पर निर्णय लेंगे- शाही
हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने को लेकर पूछे गए सवाल पर महाधिवक्ता पीके शाही ने कहा कि आदेश को पढ़ने के बाद सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने के बारे में निर्णय लेगी ।
वहीं, महाधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट जाने की अनुमति देने का आग्रह मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ से किया । खंडपीठ ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र है ।
पिछड़े वर्ग के कर्मचारी 68 प्रतिशत से ज्यादा
कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में कुल 20,49,370 सरकारी कर्मचारी हैं । जिनमें से पिछड़े वर्ग के 14,04,374 लोग सरकारी पदों पर नियुक्त हैं । जो कुल कर्मचारियों का 68.52 प्रतिशत है अनारक्षित वर्ग के पास सरकारी नौकरी में कुल पदों का 31.48 प्रतिशत है । सरकारी नौकरी में पिछड़े समुदायों का प्रतिशत केवल आरक्षण के आधार पर नहीं है ।
