सूत्र – विशेष रिपोर्ट
अयोध्या । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव- 2027 को लेकर राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज होती जा रही हैं । बहुजन राजनीति के भविष्य को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर जारी है । विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी सूत्रों का मानना है कि पिछले कुछ चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के घटते जनाधार और बदलते राजनीतिक समीकरणों का असर आगामी विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिल सकता है ।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार वर्ष 2012 के बाद से बसपा के वोट प्रतिशत के साथ-साथ लोकसभा और विधानसभा में उसके निर्वाचित सांसदों एवं विधायकों की संख्या में लगातार कमी दर्ज की गई है । इसी आधार पर कई जानकारों का मानना है कि वर्ष 2027 का चुनाव बसपा के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है ।
इधर, बहुजन राजनीति के बदलते परिदृश्य के बीच आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाने में जुटी हुई है । राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जिस दल को कभी केवल युवाओं तक सीमित माना जाता था, उसमें अब विभिन्न दलों के अनुभवी नेताओं और सेवानिवृत्त अधिकारियों का भी जुड़ाव बढ़ रहा है ।
हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री एवं अंबेडकरनगर की टांडा विधानसभा सीट से पूर्व विधायक डॉ. मसूद अहमद ने लखनऊ में आजाद समाज पार्टी की सदस्यता ग्रहण की । वहीं उत्तर प्रदेश कैडर के 1993 बैच के सेवानिवृत्त अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) प्रेम प्रकाश (रिटायर्ड आईपीएस) ने भी पार्टी की सदस्यता लेकर राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींचा ।
इसके अलावा बिजनौर के शेरकोट निवासी अरमान सैफी ने कांग्रेस छोड़कर आजाद समाज पार्टी का दामन थामा । मुरादाबाद क्षेत्र के पूर्व चेयरमैन वाजिद अंसारी भी अपने समर्थकों के साथ पार्टी में शामिल हुए । उत्तराखंड के जिला पंचायत सदस्य एवं यूथ कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय सचिव नईम प्रधान तथा उत्तराखंड यूथ कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव शाकिब चौधरी के पार्टी में शामिल होने से संगठन को नई मजबूती मिलने की चर्चा है ।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि आगामी दिनों में विभिन्न दलों से नेताओं के आने का सिलसिला जारी रहता है तो इसका असर वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है । हालांकि चुनावी नतीजे अंततः जनता के मतदान और उस समय के राजनीतिक माहौल पर ही निर्भर करेंगे ।
फिलहाल प्रदेश की राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच यह चर्चा तेज है कि वर्ष 2027 का चुनाव बहुजन राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है । आने वाले महीनों में दलों की रणनीति, संगठन विस्तार और नए राजनीतिक गठजोड़ प्रदेश की चुनावी तस्वीर को किस हद तक प्रभावित करेंगे, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं ।
