रजनीकांत शुक्ला/लवकुश आर्या ।
कानपुर । उम्मीदों का शहर कानपुर आज बहुत खुश है और होना भी चाहिए इसलिए कि 40 साल से चली आ रही मांग एयरपोर्ट पर नए सिविल टर्मिनल के रूप में पूरी होगी वो औद्योगिक शहर कानपुर जिसने खूब कमाया और सरकार को टैक्स के रुप में सरकार की झोली भरी लेकिन ऐशो आराम दूसरे शहरों के भाग्य में था ।


कानपुर एयरपोर्ट के नए टर्मिनल को बनाने का संघर्ष लंबा रहा कभी ज़मीन नहीं मिलती थी तो कभी लखनऊ से बजट नहीं आता था । जब सब कुछ हो गया,तो एक लॉबी ने पूरा दम लगाया कि कानपुर एयरपोर्ट मूर्त रूप न ले पाए,काम जान बूझकर लटकाया गया । काम होने नहीं दिया गया । आश्वासन दिए गए कि जल्द सब कुछ हो जाएगा लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा । लेकिन कानपुर अनूठा शहर है । गिरकर उठना इस शहर को आता है । कानपुर के लिए 28 दिसंबर 2021 का दिन उलझन भरा रहा ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस दिन कानपुर मेट्रो का उद्घाटन करने आए थे । लौटते समय सड़क के रास्ते लखनऊ जाना पड़ा । क्योंकि कानपुर एयरपोर्ट पर कोई सुविधा ही नहीं थी ।
‘ज़िंदा कनपुरियों’ ने अपमान महसूस किया । सोशल मीडिया पर कानपुर का मज़ाक उड़ाया गया । लेकिन कहते हैं न, समय करवट लेता है । सिस्टम उन लोगों के भरोसे चल रहा है । जो मन से ईमानदार हैं । कानपुर टर्मिनल की हालत देख मुख्यमंत्री दफ्तर एक्टिव हुआ । कई अधिकारी निलंबित हुए । निराशा के बीच उम्मीद के तौर पर बनकर आए जिलाधिकारी विशाख जी । सिविल सोसायटी के सहयोग के बीच जिलाधिकारी विशाख जी ने एयरपोर्ट की हर अड़चन दूर कराई । रेग्युलर मॉनिटरिंग हुई नतीजा, कानपुर एयरपोर्ट आज तैयार है । इस टर्मिनल का पूरा क्रेडिट जिलाधिकारी विशाख जी का है । 28 दिसंबर 2021 के ‘अपमान’ पर आज मरहम लगेगा । कानपुर चलता नहीं है,भागता है,तेज़ दौड़ता है । इतनी तेज़ दौड़ता है कि हर किसी को पीछे छोड़ता है । ये शहर किसी की दया का पात्र नहीं है । संसाधनों का समुचित बंटवारा हो या नहीं, ये शहर अपना हक़ ले लेगा । अपनी मेहनत और क्षमता के दम पर ।
