बिन्दकी/फतेहपुर । शिवपुराण केवल देवकथाओं का संग्रह नहीं,बल्कि मानव जीवन के आंतरिक संघर्षों का आध्यात्मिक ग्रंथ है । इसमें गणेश, कार्तिकेय और जालंधर की कथाएँ हमें जीवन की तीन मूल शक्तियों से परिचित कराती है । वह हैं विवेक,कर्म और अहंकार ।
यह बात आज बिन्दकी के बड़ी काली जी मंदिर में चल रहे ग्यारह दिवसीय शतचंडी महायज्ञ में प्रवचन स्थल पर बोलते हुए ब्यास राजीव शरण शास्त्री ने कही ।
उन्होंने शिव पुराण पर प्रति दिन हो रही कथा में कहा कि सर्व प्रथम गणेश जी का प्राकट्य होता है । पार्वती जी अपने उबटन से एक बालक की रचना करती हैं और उसे द्वारपाल बनाती हैं । यह कथा संकेत देती है कि मानव का व्यक्तित्व प्रकृति से बनता है । गणेश द्वार पर खड़े हैं—यह द्वार है अंतःकरण का । जब स्वयं शिव आते हैं और गणेश उन्हें नहीं पहचान पाते, तब संघर्ष होता है । यह संघर्ष बताता है कि अहंकार जब विवेकहीन होता है, तो वह सत्य को भी रोक देता है । गणेश का मस्तकच्छेदन पुराने दृष्टिकोण का अंत है और हाथी का सिर—विशाल बुद्धि का प्रतीक । इसलिए गणेश प्रथमपूज्य हैं । क्योंकि बिना विवेक के कोई भी कर्म शुभ नहीं हो सकता ।
इसके बाद कार्तिकेय जी का जन्म होता है। शिव का तेज, अग्नि द्वारा वहन होकर गंगा में प्रवाहित होता है और कृतिकाओं द्वारा पाला जाता है । यह कथा बताती है कि शुद्ध संकल्प जब ऊर्जा और प्रवाह पाता है तब वह कर्म बनता है । कार्तिकेय देवताओं के सेनापति हैं वे अनुशासित कर्मशक्ति के प्रतीक हैं । वे तारकासुर का वध करते हैं अर्थात् केवल चेतना से उत्पन्न कर्म ही अज्ञान का नाश कर सकता है ।
अब आती है जालंधर की कथा । जालंधर तपस्वी है, शिवभक्त है, धर्मपालक है—परंतु अहंकार से ग्रस्त हो जाता है । उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व उसे अजेय बनाता है पर जब विवेक पर माया छा जाती है तो अहंकार का अंत निश्चित हो जाता है जालंधर का शिव द्वारा वध यह सिखाता है कि अहंकार चाहे तप से जन्मा हो, यदि वह मर्यादा लांघे, तो उसका नाश अनिवार्य है ।
राजीव शरण शास्त्री ने कहा कि इस प्रकार शिवपुराण का संदेश स्पष्ट है । पहले गणेश का विवेक,फिर कार्तिकेय का कर्म और अंत में जालंधर जैसे अहंकार का विसर्जन । यही जीवन की साधना है, यही शिवतत्त्व की कृपा है । इस मौके पर अध्यक्ष शुभम कसेरा ने व्यास पीठ की आरती की ।
महादेव रुद्राक्ष का तेरह फ़ीट का शिवलिंग आकर्षण का केंद्र
यज्ञ स्थल पर महादेव रुद्राक्ष के दिनेश चंद्र वर्मा व अभिषेक वर्मा द्वारा बनाया गया । लगभग एक लाख रुद्राक्ष से बनाया गया । तेरह फ़ीट ऊँचा शिव लिंग स्वरुप आकर्षण का केंद्र है ।
रुद्राक्ष और रत्नो के व्यापारी इसी हजरतपुर बिन्दकी के निवासी दिनेश चंद्र वर्मा बताते हैं कि उन्हें महादेव जी से प्रेरणा मिली कि यज्ञ स्थल पर रुद्राक्ष का शिवलिंग बनना चाहिए तो बना डाला । ज्ञात हो कि दिनेश और उनके पुत्र अभिषेक विभिन्न मठो और अखाड़ों को भी रुद्राक्ष की आपूर्ति करते है । अभी प्रयागराज के कुम्भ मेला में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी थीं ।
