वाराणसी । प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला अदालतों में मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने और जिला न्यायपालिका द्वारा मांगी गई सूचनाएं उपलब्ध न कराने पर गंभीर चिंता जताई है ।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने चार याचिकाओं की सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली ऐसी देरी को किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं माना जा सकता । बल्कि यह संस्थागत व्यवहार का परिणाम है ।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि किसी मामले में 20 साल से अधिक समय तक आरोप तय नहीं हो पाते और कुछ मुकदमे 40 साल से ज्यादा समय तक लंबित रहते हैं तो यह न्यायिक संस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है । अदालत ने मुकदमों के शीघ्र निस्तारण और न्यायिक प्रक्रिया में जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया ।
हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश से फुल कोर्ट बुलाने तथा हाईकोर्ट रूल्स 1952 के अनुपालन को लेकर संवाद शुरू करने पर विचार करने का अनुरोध किया है साथ ही फैसले की प्रति केंद्रीय विधि मंत्रालय के न्याय विभाग को भेजने की बात कही गई है ।
अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को पूरे रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया है । हाईकोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि लंबित मुकदमों की समस्या केवल मामलों की संख्या तक सीमित नहीं,बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की गति,रिकॉर्ड प्रबंधन और संस्थागत जवाबदेही से भी जुड़ी हुई है ।
