– यहां का किसान अब की बार लिखेगा प्रत्याशियों की तकदीर ।
फतेहपुर : आने वाली 23 फरवरी को विधानसभा प्रत्याशियों की तकदीर यहां का किसान लिखेगा । भाग्यविधाता किसानों की चुप्पी से सत्ता पक्ष सहित सभी दलों के प्रत्याशी बेचैन दिख रहे हैं और अपनी तरफ लाने की कवायद कर रहे हैं । पानी,बिजली,खाद,बीज के साथ-साथ कर्ज के बोझ में दबे किसानों को विधानसभा के चुनाव में एक बार फिर ऐसा मौका मिल गया है । जिसके जरिए वह एक ऐसे जनप्रतिनिधि का चुनाव कर सकते हैं जो उनकी आवाज बनकर विधानसभा के गलियारों तक पहुंचाने में कामयाब हो सके । सियासत की इस जंग में पिछले कई महीनों से सभी दल किसानों की बात करके अपनी ओर आकर्षित करने में जुटे हुए हैं । इतना ही नहीं किसानों को अपने पाले में लाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने 3 कृषि कानूनों को वापस लेकर साफ जाहिर कर दिया कि वह किसानों की हितुआ है । लेकिन ऐन वक्त में जिले के किसान किसे अपना प्रतिनिधि बनाएंगे इस पर बड़ा सवाल खड़ा है ?
जिले के 401071 किसान किसकी तकदीर लिखेंगे ?
यह तो पता नहीं लेकिन इन किसानों को रिझाने का काम राजनैतिक दलों द्वारा शुरू कर दिया गया है ।
प्रयागराज एवं कानपुर महानगर के मध्य बसे फतेहपुर जनपद को दोआबा के क्षेत्र से जाना जाता है । बिन्दकी विधानसभा क्षेत्र के राष्ट्रीय मार्ग में मलवां-चौडगरा में औद्योगिक इकाइयां भले ही स्थापित कर यह बताने की कोशिश की गई कि जिला उद्योग के क्षेत्र में भी पीछे नहीं है । समय के साथ-साथ यहां की औद्योगिक इकाइयां बद से बदतर स्थिति में पहुंचती चली गईं । जिले की सभी विधानसभा सीटें किसान बाहुल्य मानी जाती हैं । करीब 29 लाख की आबादी वाले जनपद में 401071 किसान हैं । इन किसानों में केंद्र सरकार द्वारा 3,63000 किसानों को किसान सम्मान निधि दी जा रही है । लेकिन खेती बारी के जो हालात यहां है । उससे मिलने वाली किसान सम्मान निधि ऊंट के मुंह में जीरे का काम कर रही है ।
यहां किसानों की उपज गेहूं,धान के साथ-साथ तिलहन, दलहन है । नहरों में पानी न आने और सरकारी नलकूपों की हालत खराब होने के अलावा महंगी बिजली,खाद बीज को लेकर उनके बीच मारामारी रहती है ।
किसानों को राहत देने की बात भले ही की गई हो लेकिन चुनावी जंग खत्म होने के बाद कर्ज से डूबे किसानों की हालत देखते ही बनती है ।
अभी भी जिले में 1 लाख 85 हजार 700 किसान ऐसे हैं जो खेती बारी के लिए कर्ज में ही आश्रित हैं । विधानसभा के इस चुनाव में जिले का किसान भी जागरूक दिखाई पड़ रहा है । चुनाव के शुरुआती दौर में वह उम्मीदवारों को तरजीह देने में नहीं दिखा । उम्मीदवारों ने किसानों के घरों में दस्तक देनी शुरू की तो वह सीधे खेत खलिहान की ओर चला गया और जब प्रत्याशी वहां पहुंचे तो किसानों ने इधर-उधर की बातें कर उनका दिल बहला दिया । किसानों के रहनुमा बने किसान नेताओं ने भी इस चुनाव में अपने पसंद के उम्मीदवारों का समर्थन करना शुरू कर दिया है । वह भी साल-दर-साल किसानों की मूलभूत समस्याओं का निराकरण कराने की नेताओं के सरीके केवल बात ही करते रहे लेकिन उन्हें अमल में नहीं ला सके ।
जिस तरह से किसानों की हालत पतली है और जिले का किसान सूखा,अतिवृष्टि व ओलावृष्टि से जूझता आ रहा है । यहां हालत यह है कि किसानों को उनकी फसलों का सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है । सरकारी खरीद केंद्रों में बिचौलिए हावी रहते हैं और किसानों को खुले बाजार में अपनी उपज को बेचना पड़ता है । मूलभूत समस्याएं नहरों में पानी,ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त बिजली न मिलने के साथ-साथ महंगी बिजली ,खाद,बीज,डीजल सहित कीटनाशक दवाएं व सरकारी नलकूपों की दगाबाजी ने इनकी हालत को पतली करके रखा है । ऊपर से महंगाई इनकी समस्याओं को और बढ़ाए है ।
हो कुछ भी लेकिन अपनी दुर्गति से आजिज किसान विधानसभा चुनाव में सोच समझकर अपने प्रतिनिधि का चुनाव करने के मूड में नजर आ रहे हैं । फिलहाल किसानों की चुप्पी ने राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के बीच खलबली मचा रखी है ।
